आईआईटी बॉम्बे मामला: एफआईआर में एससी/एसटी एक्ट लगाने पर छिड़ी देशव्यापी बहस, कानून के सही या गलत इस्तेमाल को लेकर बंटे विचार

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आईआईटी बॉम्बे में छात्र साहिल वाकोडे की दुखद मौत के बाद मुंबई पुलिस द्वारा प्रोफेसर सूर्यनारायण दूल्ला और अन्य के खिलाफ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) के तहत मामला दर्ज करने के कदम ने एक गंभीर सामाजिक और कानूनी बहस को जन्म दे दिया है। इस मामले में एक तरफ जहां पीड़ित परिवार और समर्थक छात्र इसे न्याय की लड़ाई के लिए एक जरूरी और सही कदम मान रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ शिक्षाविदों, फैकल्टी फोरम और कई तकनीकी दिग्गजों ने इस कानून के दुरुपयोग और शैक्षणिक व्यवस्था पर इसके नकारात्मक प्रभाव को लेकर गहरी चिंता जताई है। सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा की मीडिया तक इस बात पर तीखी बहस छिड़ गई है कि परीक्षा में नकल पकड़ने जैसी एक सामान्य शैक्षणिक प्रक्रिया में इस कड़े कानून को लागू करना कितना जायज है।पारदर्शिता और न्याय के लिए एससी/एसटी एक्ट को सही बताने वाला पक्षमृतक छात्र के माता-पिता और उनके कानूनी प्रतिनिधि एडवोकेट निखिल कांबले का दृढ़ता से मानना है कि संस्थान में उनके बेटे के साथ लंबे समय से जातिगत भेदभाव हो रहा था। पिता का आरोप है कि साहिल को पिछले तीन महीनों से मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा था और परीक्षा में मोबाइल फोन या चैटजीपीटी (ChatGPT) के इस्तेमाल की कहानी केवल संस्थान की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने और उनके बेटे की छवि खराब करने के लिए गढ़ी गई है।

समर्थकों का तर्क है कि भारत के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में हाशिए के समुदायों से आने वाले छात्रों को अक्सर सूक्ष्म या प्रत्यक्ष रूप से संस्थागत उत्पीड़न और अलगाव का सामना करना पड़ता है। ऐसे में बिना कड़ी धाराओं के निष्पक्ष जांच संभव नहीं है और यह कानून ही वंचित वर्ग के छात्रों को सुरक्षा तथा न्याय दिलाने का एकमात्र कानूनी जरिया है, ताकि संस्थान में व्याप्त किसी भी प्रकार के जातिगत पूर्वाग्रह को सामने लाया जा सके।

अकादमिक स्वतंत्रता पर प्रहार और दुरुपयोग की चिंता जताने वाला विरोधी पक्ष

इसके विपरीत, आईआईटी बॉम्बे के फैकल्टी फोरम और देश के कई बड़े विश्लेषकों व टेक संस्थापकों ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई है कि प्रोफेसर सूर्यनारायण दूल्ला जैसे एक सम्मानित शिक्षक, जिन्हें कई शिक्षण और शोध पुरस्कार मिल चुके हैं, उन्हें केवल परीक्षा में नकल रोकने के लिए अपनी जिम्मेदारी निभाने पर इस कानून के तहत आरोपी बना दिया गया। विरोध करने वालों का कहना है कि जब कोई छात्र परीक्षा हॉल में गैजेट के साथ पकड़ा जाता है, तो उस पर कार्रवाई करना संस्थान की शैक्षणिक नीति का हिस्सा होता है, न कि किसी जातिगत विद्वेष का। आलोचकों और राजनीतिक टिप्पणीकारों ने चिंता जताई है कि इस कड़े कानून का इस्तेमाल अब बदला लेने, शैक्षणिक दबावों को दबाने या व्यक्तिगत हिसाब चुकता करने के लिए एक हथियार के रूप में किया जा रहा है। उनका तर्क है कि अगर शिक्षकों पर परीक्षा में नियमों का पालन कराने के बदले ऐसे गैर-जमानती और कड़े मुकदमों का खतरा मंडराएगा, तो कोई भी प्रोफेसर निष्पक्ष रूप से परीक्षा की शुचिता बनाए रखने का साहस नहीं कर पाएगा, जिससे देश की पूरी शिक्षा प्रणाली पंगु हो सकती है।

यह संवेदनशील मामला अब मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच के पास है, जहाँ सहायक पुलिस आयुक्त स्तर के अधिकारी इन सभी पहलुओं की गहन जांच कर रहे हैं। अदालत और पुलिस की अंतिम रिपोर्ट ही यह तय करेगी कि क्या वाकई छात्र साहिल संस्थागत जातिवाद का शिकार हुआ था या फिर नियमों का उल्लंघन पकड़े जाने के बाद लगे इस आरोप में कानून का दुरुपयोग किया गया है।

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