कुर्सी की चिंता, खनिज संपदा और बदहाल जनता : मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी में जब जनप्रतिनिधियों को सूझी अपनी पूछ-परख

कमल कुमार मेश्राम।मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिले की राजनीति में इन दिनों जबरदस्त जनसेवा का उफान आया हुआ है। यह अलग बात है कि इस सेवा का दायरा जनता के जल, स्कूल और अस्पताल से शुरू होकर सिर्फ और सिर्फ अपनी कुर्सी के हत्थे पर जाकर खत्म हो जाता है। खबर है कि जिला पंचायत अध्यक्ष नम्रता सिंह की कुर्सी हिलाने के लिए कांग्रेस और भाजपा समेत सात दूरदर्शी जिला पंचायत सदस्य एक साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हो गए हैं। राजनीति में इसे कहते हैं अद्भुत वैचारिक मिलन जहां जनता के मुद्दों पर दल बदलते हों न बदलते हों, लेकिन अविश्वास प्रस्ताव के नाम पर सारे वैचारिक मतभेद हवा में उड़ जाते हैं।

दरअसल इन माननीयों को रात में नींद न आने की वजह खडगांव या पल्लेमाड़ी के लोगों को पीने का गंदा पानी मिलना नहीं है, और न ही इस बात से पेट में दर्द है कि खदानों वाले अतिप्रभावित क्षेत्रों के स्कूल और अस्पताल बदहाली के किस स्तर पर जी रहे हैं। असली चिंता तो पद, प्रतिष्ठा और अपनी पूछ-परख की है। डीएमएफ (DMF) फंड का पैसा सही जगह लग रहा है या गड्ढे में जा रहा है, इससे इन नेताओं को भला क्या लेना-देना? उनके हिसाब से फंड का सदुपयोग शायद वही है, जहां उनके अपने राजनीतिक वजूद को उचित सम्मान और वजन मिल सके।

वर्षों से पल्लेमाड़ी की लौह अयस्क खदानों से गड़गड़ाहट के साथ ट्रक भर-भरकर खनिज निकल रहा है, लेकिन क्षेत्रवासियों की किस्मत में धूल, धुआं और पिछड़ापन ही आया। खनिज नियमों की किताबें भले ही अतिप्रभावित क्षेत्रों के कायाकल्प की बड़ी-बड़ी बातें करती हों, पर हमारे इन जनप्रतिनिधियों के पास उन गांवों में जाकर जनता का हाल पूछने का न तो वक्त है और न ही उतनी ‘साहस’।

पार्टी निष्ठा की बातें तो छोड़ ही दीजिए जब अपनी कुर्सी और वजूद का सवाल आए, तो पार्टी का झंडा भी खूंटी पर टांग दिया जाता है। अपने और अपनी राजनीति के प्रति यह अगाध समर्पण वाकई काबिले-तारीफ है। जनता आज भी पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा की बुनियादी मांगों के लिए तरस रही है, और उधर हमारे माननीय अविश्वास का गणित बिठाने में अपनी पूरी ऊर्जा खपा रहे हैं। जनता समझ रही है कि साहब लोगों को क्षेत्र के विकास से नहीं, सिर्फ अपनी मान-प्रतिष्ठा के तराजू का पलड़ा भारी करने से मतलब है।

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