पारा से सोना बनाने की प्राचीन विद्या के ज्ञाता प्रख्यात आयुर्वेदाचार्य डॉ. सिद्धि नंदन मिश्र का निधन

वाराणसी। रसशास्त्र के अद्वितीय विशेषज्ञ और राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित प्रोफेसर डॉ. सिद्धि नंदन मिश्र का 98 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। उन्होंने बिहार के जहानाबाद जिले के हुलासगंज प्रखंड स्थित अपने पैतृक गांव कंदौल में अंतिम सांस ली, जहां हृदयगति रुकने से उनका महाप्रयाण हुआ। उनके निधन की खबर मिलते ही संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय सहित देश के तमाम आयुर्वेदिक संस्थानों और चिकित्सा जगत में शोक की लहर दौड़ गई। विश्वविद्यालय परिसर में शिक्षकों और शिष्यों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए आयुर्वेद अनुसंधान में उनके अतुलनीय योगदान को याद किया।

दुरुपयोग रोकने के लिए किसी को नहीं दी पारा से सोना बनाने की दीक्षा

डॉ. सिद्धि नंदन मिश्र भारत के एकमात्र ऐसे महान वैद्य थे, जिन्हें रसशास्त्र की सबसे रहस्यमयी और प्राचीन विधा ‘पारद से स्वर्ण निर्माण’ (पारे से सोना बनाने की कला) में पूर्ण महारत हासिल थी। वे इस गोपनीय रासायनिक सूत्र और विधा को जानने वाले आधुनिक युग के आखिरी स्तंभ माने जाते थे। औषधीय और लोक-कल्याणकारी उपयोग के लिए उन्हें इस गुप्त विद्या का पूरा ज्ञान था, लेकिन इस परम गोपनीय रासायनिक सूत्र का भविष्य में कोई अनैतिक या व्यावसायिक दुरुपयोग न कर सके, इसलिए उन्होंने अपने पूरे जीवनकाल में यह दीक्षा किसी भी अन्य व्यक्ति को हस्तांतरित नहीं की।

कालजयी ग्रंथों की रचना से समृद्ध की रसशास्त्र की धरोहर

एक असाधारण चिकित्सक होने के साथ-साथ डॉ. मिश्र संस्कृत भाषा के प्रकांड विद्वान और लेखक थे। उन्होंने रसशास्त्र जैसे अत्यंत जटिल और गूढ़ विषय पर संस्कृत में कई प्रामाणिक एवं मार्गदर्शक पुस्तकों की रचना की। उनके द्वारा रचित और अनूदित ग्रंथों का विभिन्न देशी-विदेशी भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है। आज भी देश के सभी प्रमुख आयुर्वेद विश्वविद्यालयों में स्नातक (BAMS) और स्नातकोत्तर (MD) के विद्यार्थियों को उनकी पुस्तकें अनिवार्य रूप से पढ़ाई जाती हैं। उनके लिखे ग्रंथ आज भी नए शोधार्थियों और चिकित्सकों के लिए एक सच्चे पथ-प्रदर्शक का कार्य कर रहे हैं।

राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित और देश के शीर्ष संस्थानों में सेवाएं

आयुर्वेद और शिक्षा के क्षेत्र में उनके जीवनभर के अप्रतिम अवदान के लिए भारत सरकार द्वारा उन्हें देश के सर्वोच्च अकादमिक सम्मानों में से एक ‘राष्ट्रपति पुरस्कार’ से नवाजा गया था। वाराणसी के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में आयुर्वेद विभागाध्यक्ष के रूप में ऐतिहासिक सेवाएं देने के अलावा, उन्होंने गुजरात आयुर्वेदिक यूनिवर्सिटी (जामनगर) और राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज (पटना) जैसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय संस्थानों में भी अपना अमूल्य योगदान दिया था। उनके द्वारा तैयार किए गए शिष्य आज दुनिया भर में भारतीय चिकित्सा पद्धति का गौरव बढ़ा रहे हैं।

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