आदिम संस्कृति, असीमित खनिज संपदा और धान के कटोरे के रूप में विख्यात छत्तीसगढ़ का राज्य बनना केवल एक राजनीतिक फैसला नहीं था, बल्कि यह सदियों पुरानी सांस्कृतिक पहचान की बहाली और दशकों लंबे जनआंदोलन के बाद मिला एक ऐतिहासिक अधिकार था। देश के नक्शे पर 26वें राज्य के रूप में 1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ का जन्म हुआ, लेकिन इस मुकाम तक पहुँचने का रास्ता बेहद लंबा और संघर्षपूर्ण रहा है।
रामचरितमानस के ‘दक्षिण कोसल’ से ‘छत्तीसगढ़’ बनने का सफर
इस भूभाग की ऐतिहासिक जड़ें बेहद गहरी हैं, जिसका उल्लेख रामायण और महाभारत काल में ‘दक्षिण कोसल’ और ‘दंडकारण्य’ के रूप में मिलता है। प्राचीन काल में मौर्य, गुप्त, शरभपुरीय और विशेष रूप से कलचुरी राजवंश ने यहाँ सदियों तक शासन किया। इतिहासकारों के अनुसार, कलचुरी राजाओं के दौर में इस क्षेत्र में 36 मजबूत गढ़ या किले हुआ करते थे, जिसके आधार पर रतनपुर और रायपुर के अधीन आने वाले इस पूरे विस्तृत हिस्से का नाम धीरे-धीरे ‘छत्तीसगढ़’ पड़ गया। ब्रिटिश शासनकाल में इसे मध्य प्रांत का हिस्सा बनाया गया और प्रशासनिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए रायपुर को इसका मुख्यालय घोषित किया गया था।
स्वतंत्रता के बाद उपेक्षा और अलग राज्य के संकल्प की शुरुआत
साल 1947 में जब देश आजाद हुआ, तो देश की तमाम रियासतों का विलय कर इसे मध्य प्रदेश राज्य में मिला दिया गया। मध्य प्रदेश का हिस्सा रहते हुए यह महसूस किया जाने लगा कि प्रचुर मात्रा में कोयला, लौह अयस्क और बॉक्साइट जैसे खनिज संसाधन होने के बावजूद इस क्षेत्र का उतना विकास नहीं हो पा रहा था, जितना होना चाहिए था। भौगोलिक रूप से विशाल मध्य प्रदेश की तत्कालीन राजधानी भोपाल से इस अंतिम छोर की दूरी बहुत ज्यादा थी, जिसके चलते छत्तीसगढ़ की स्थानीय समस्याओं, आदिवासी संस्कृति और जनहित की योजनाओं पर प्रशासनिक ध्यान नहीं जा पाता था। यही वह वजह थी जिसने यहाँ के लोगों के भीतर अपनी खुद की सरकार और अपनी पहचान की मांग को जन्म दिया।
डॉ. सुंदरलाल शर्मा का सपना और महासंघर्ष की पहली चिंगारी
अलग राज्य की वैचारिक नींव काफी पहले ही रखी जा चुकी थी। साल 1918 में छत्तीसगढ़ के गांधी कहे जाने वाले पंडित सुंदरलाल शर्मा ने पहली बार पृथक छत्तीसगढ़ राज्य की स्पष्ट संकल्पना की थी। इसके बाद साल 1924 में रायपुर की कांग्रेस यूनिट द्वारा इस मांग को पहली बार संगठित रूप से सामने रखा गया। समय बीतने के साथ यह मांग थमने के बजाय और तेज होती गई। साल 1953 में जब फजल अली की अध्यक्षता में राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन हुआ, तब भी छत्तीसगढ़ के नेताओं ने पुरजोर तरीके से अलग राज्य का दावा पेश किया, लेकिन उस वक्त इस मांग को टाल दिया गया। इस फैसले से असंतोष बढ़ा और 1970 से 1990 के दशकों में युवा नेताओं और आम जनता ने मिलकर संघर्ष को एक जनआंदोलन का रूप दे दिया।
संसद से मुहर और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का ऐतिहासिक वादा
साल 1990 के दशक में छत्तीसगढ़ की यह गूंज दिल्ली के गलियारों तक पहुँच चुकी थी। साल 1994 में मध्य प्रदेश विधानसभा ने सर्वसम्मति से छत्तीसगढ़ राज्य गठन के पक्ष में एक अशासकीय प्रस्ताव पारित किया, जिससे इस मांग को बड़ी राजनीतिक ताकत मिली। इसके बाद साल 1998 के आम चुनावों के दौरान एक बड़ी रैली में देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने छत्तीसगढ़ की जनता से वादा किया था कि यदि केंद्र में उनकी सरकार बनती है, तो वे छत्तीसगढ़ को एक स्वतंत्र राज्य का दर्जा देंगे। अपने इसी वादे को निभाते हुए अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने साल 2000 में संसद के पटल पर ‘मध्य प्रदेश पुनर्गठन विधेयक’ पेश किया, जिसे लोकसभा और राज्यसभा से भारी समर्थन के साथ पारित कर दिया गया।
1 नवंबर 2000 की वो ऐतिहासिक रात जब छत्तीसगढ़ ने ली नई सांस
विधेयक पर राष्ट्रपति की अंतिम मुहर लगने के बाद 1 नवंबर 2000 की तारीख तय की गई। मध्य प्रदेश के नक्शे से काटकर कुल 16 जिलों को मिलाकर भारत का 26वां राज्य ‘छत्तीसगढ़’ अस्तित्व में आया। रायपुर को नए राज्य की गौरवशाली राजधानी बनाया गया और अजीत जोगी ने राज्य के पहले मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली। इस ऐतिहासिक बदलाव ने छत्तीसगढ़ के जंगलों, पहाड़ों, खदानों और मैदानों में रहने वाले करोड़ों लोगों को एक नया आत्मसम्मान दिया। आज अलग राज्य बने ढाई दशक से ज्यादा का समय बीत चुका है और इन सालों में छत्तीसगढ़ ने देश के सबसे तेजी से बढ़ते औद्योगिक, बिजली उत्पादन और कृषि प्रधान राज्यों में अपनी एक बेहद मजबूत पहचान स्थापित कर ली है।







