डोंगरगांव (दीपक अवस्थी)।छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने 21 जुलाई 2025 को स्पष्ट कहा था कि “त्योहारी सीज़न में सड़कों पर पंडाल या स्वागत द्वार लगाने के लिए संबंधित कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य होगा। जब तक नई पॉलिसी नहीं आती, वर्तमान गाइडलाइन का कड़ाई से पालन किया जाए।” कोर्ट ने साथ ही यह उम्मीद भी जताई थी कि “प्रशासन जल्द ही नई नीति बनाएगा, ताकि जनता को असुविधा न हो।”
लेकिन डोंगरगांव की हकीकत कोर्ट के आदेश के उलट है। जगह-जगह पंडाल खड़े हैं। हैरानी यह कि किसी भी समिति ने अनुमति के लिए आवेदन तक नहीं दिया है।
पुलिस की समझाइश, पर अनुमति गायब
25 अगस्त को थाना परिसर में शांति समिति की बैठक हुई। अधिकारियों ने समितियों को दिशा-निर्देश दिए—सड़क और बिजली पोल के नीचे पंडाल न लगें, डीजे की जगह धुमाल बजे, झांकियों का आकार मार्ग के अनुसार तय हो और पंडाल में अग्निशमन सहित सीसीटीवी कैमरे लगें।
लेकिन बड़ा सवाल यही है कि जब कोई अनुमति जारी ही नहीं हुई, तो फिर पंडाल लग कैसे रहे हैं?
हाई कोर्ट की टिप्पणी बनाम ज़मीनी सच्चाई
हाई कोर्ट ने कहा था कि “त्योहारी अवसरों पर भीड़ प्रबंधन और यातायात व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए प्रशासन अनुमति प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करे।”
डोंगरगांव की सड़कों पर आज जो हालात हैं, वह कोर्ट की टिप्पणी की धज्जियां उड़ाते दिख रहे हैं। बिना लिखित अनुमति के चौक-चौराहों और गलियों में पंडाल खड़े हैं।
13 समितियां, शून्य आवेदन
डोंगरगांव में इस बार कुल 13 समितियां गणेश प्रतिमा स्थापित कर रही हैं। एसडीएम श्रीकांत कोराम ने खुद माना—“किसी भी समिति ने पंडाल लगाने का अनुमति फार्म नहीं लिया है। प्रशासन द्वारा दिए गए दिशा-निर्देश का पालन करवाया जाएगा।”





