गजेंद्र साहू ,रायपुर । क्या हुआ ?? शीर्षक पढ़कर बुरा लगा ?? लगना भी चाहिए। क्यूंकि इसके जिम्मेदार हम सभी हैं। सभी का थोड़ी-थोड़ी मात्रा में योगदान है यहाँ तक आने में।
स्वागत है आपका भक्ति के नए युग में। जहाँ भगवान गणेश का स्वागत दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए नहीं बल्कि दोनों हाथ जोड़कर रील्स बनाने से किया जाता है। और ये कोई भक्ति भाव के कारण नहीं होता कि बाद में इसी फोटो/रील्स को देखकर गणपति जी को याद करेंगे उन्हें प्रणाम करेंगे नहीं!! बिल्कुल नहीं। वो इसलिए है ताकि उसे सोशल मीडिया में पोस्ट कर कुछ फोकटिया लाइक/व्यू/ कमेंट पा सके।
गणपति जी का एक स्वरूप है। बचपन से पौराणिक कथाओं, पुराणों, कहानियों और टीवी पर देखकर जाना है कि उनका शीश हाथी का है जिसकी एक लंबी सूंड है। उन्हें मोदक अत्यंत प्रिय है। वे लंबोदर है। एक दाँत टूटा हुआ है और भी कुछ चीजे जो हमें बचपन से सिखाई गई और हमने गणेश जी की एक छवि बना ली। वर्तमान पीढ़ी क्या गणपति जी को भविष्य में पहचान पाएंगी ?? क्यूंकि वे कभी शंकर, कभी कृष्ण, कभी हनुमान, कभी विष्णु और तो और कभी छपरी फ़िल्म किरदारो के रूप में पंडालों में दिखाए जा रहे हैं। यह कहाँ तक उचित है??
मैं ये पूछना चाहता हूँ जहाँ वे कृष्ण, हनुमान, शंकर या अन्य देवता के स्वरूप में हैं वहाँ गणेश जी की आरती के अलावा उनकी भी आरती होती है? यदि नहीं होती तो ये उन देवताओं का अपमान है। पहनावा?? जो इंसान की सभ्यता का परिचय है?? पर कुछ जाहिल लोग ने इसे भी बिगाड़ दिया है। ऑफ सोल्डर परिधान भारतीय संस्कृति का हिस्सा नहीं है वह भी तक जब बात भगवान की हो। आपको किसने अधिकार दिया पश्चात संस्कृति को हम पर थोपने की। उनसे भी जाहिल वे लोग हैं जो रील्स और फोटो/वीडियो को प्राथमिकता देते हैं और ऐसे घटिया मानसिकता का विरोध नहीं करते।
स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए एकता, परिचर्चा और संगठन दृढ़ता के लिए शुरू हुए गणेशोत्सव का आयोजन आज ऐसी स्वतंत्रता पा चुका है जहाँ फूहड़ता, हिंसा और अभद्रता पनपने लगी है। इस पर विचार करना और उसका जल्द से जल्द समाधान करना अति आवश्यक है।
अब भगवान की मर्जी नहीं चलती। भगवान ने लोगों को बनाया है उसी इंसान ने भगवान को चुनौती देना शुरू कर दिया है। इन तुच्छ मानव का इतना दुस्साहस हो चुका है कि वे भगवान को अपने हिसाब से मनचाहा स्वरूप में ढालना चाहते हैं। गणेश चतुर्थी के पहले पंडालों में गणेश जी का पहुंच जाना और विसर्जन के बाद पंडालों में उन्हें रोकना। क्यूंकि डीजे और धूमाल वाले के समय के अनुसार गणपति जी के आने-जाने का कार्यक्रम डिसाइड होने लगा है। यह न्यायोचित नहीं है।
दूसरे धर्म अभी बहुत दूर है। वे सनातन धर्म के पतन का सोच भी नहीं सकते। अभी हिंदू धर्म को ऐसे पाखंडी हिंदुओं से ही खतरा है। अभी भी वक्त है संभालने का। नहीं तो हिंदू धर्म जिस तरह भस्मासुर बनकर धीरे-धीरे अपनी ही संस्कृति को भस्म कर रहा है वह दिन दूर नहीं जब यह भस्मासुर अपने सर पर ही हाथ रख दे। समय रहते सभी को आगे आना होगा और इसका कड़ा विरोध करना होगा।





