करवा चौथ 2026: अखंड सौभाग्य और सुहाग की सुरक्षा का महापर्व, जानें क्यों और कैसे मनाया जाता है यह व्रत

देशभर में सुहागिन महिलाओं का सबसे बड़ा और पवित्र त्योहार करवा चौथ आज मनाया जा रहा है। हिंदू पंचांग के अनुसार यह पावन पर्व हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को आता है। इस विशेष दिन पर विवाहित स्त्रियाँ सूर्योदय से लेकर रात में चंद्रोदय होने तक पूरी तरह निर्जला उपवास रखती हैं。 इस कठिन तपस्या का मुख्य उद्देश्य अपने पति की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की मंगल कामना करना होता है। यह त्योहार सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह पति-पत्नी के बीच आपसी प्रेम, अटूट विश्वास और एक-दूसरे के प्रति पूर्ण समर्पण का सबसे खूबसूरत प्रतीक माना जाता है।

सैन्य इतिहास और पतियों की सुरक्षा से जुड़ा है त्योहार का इतिहास

धार्मिक और ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन समय में उत्तर और उत्तर-पश्चिमी भारत के अधिकांश पुरुष देश की सीमाओं की रक्षा के लिए सेना में भर्ती होते थे। जब पुरुष युद्ध के मैदान में जाते थे, तब घर पर उनकी पत्नियां उनकी सुरक्षित वापसी और दीर्घायु के लिए विशेष पूजा-अर्चना और उपवास किया करती थीं। समय के साथ पतियों की लंबी उम्र की यह प्रार्थना एक मजबूत परंपरा में बदल गई और इसे करवा चौथ के रूप में मनाया जाने लगा। इसके अतिरिक्त, इस त्योहार का एक पहलू कृषि संस्कृति से भी जुड़ा है, क्योंकि यह समय रबी की फसल, विशेष रूप से गेहूं की बुवाई का होता है, जिसके चलते महिलाएं बेहतर फसल और समृद्धि की कामना के लिए भी प्रार्थना करती हैं।

ऐसे पड़ा इस पावन व्रत का नाम ‘करवा चौथ’

इस पर्व का नाम दो महत्वपूर्ण शब्दों के मेल से बना है, जिसमें ‘करवा’ का अर्थ मिट्टी या धातु के उस छोटे सुंदर पात्र (घड़े) से है जिसमें जल या अनाज भरा जाता है। वहीं ‘चौथ’ का तात्पर्य कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि से है। इस दिन पूजा के समय मिट्टी के करवे का विशेष उपयोग होता है और रात में इसी पात्र से चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। यही कारण है कि इस पूरे व्रत और उत्सव को करवा चौथ के नाम से जाना जाता है।

पौराणिक कथाओं में छिपा है इस व्रत का गहरा महत्व

शास्त्रों में करवा चौथ के व्रत को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें सबसे प्रसिद्ध सती वीरावती की कहानी है। वीरावती ने अपने पतियों के प्रेमवश भाइयों द्वारा दिखाए गए नकली चांद को देखकर व्रत खोल दिया था, जिससे उसके पति की मृत्यु हो गई थी। बाद में उसकी सच्ची भक्ति और तपस्या को देखकर देवी ने उसके पति को पुनः जीवित कर दिया। इसके अलावा महाभारत काल में द्रौपदी द्वारा पांडवों की रक्षा के लिए भगवान कृष्ण के कहने पर यह व्रत रखने का उल्लेख मिलता है। सावित्री और सत्यवान की कथा भी इस बात का प्रमाण है कि एक पत्नी अपने दृढ़ संकल्प से यमराज के हाथों से भी अपने पति के प्राण वापस ला सकती है।

सरगी से लेकर चंद्र दर्शन तक की मुख्य परंपराएं

इस पावन व्रत की शुरुआत तड़के सूर्योदय से पहले ही हो जाती है, जब सास अपनी बहू को प्रेमस्वरूप ‘सरगी’ भेंट करती है। इस सरगी में फल, मेवे, मिठाइयां और सात्विक भोजन शामिल होता है, जिसे ग्रहण करने के बाद महिलाएं अपना निर्जला व्रत शुरू करती हैं। शाम के समय सभी सुहागिन महिलाएं नए लाल या पीले वस्त्र पहनती हैं, हाथों में सुंदर मेहंदी रचाती हैं और सोलह शृंगार करके एक जगह एकत्रित होती हैं। यहाँ वे मिलकर भगवान शिव, माता पार्वती, गणेश जी और करवा माता की विधि-विधान से पूजा करती हैं और करवा चौथ की पारंपरिक व्रत कथा सुनती हैं।

रात को जब आसमान में चांद निकलता है, तो सभी महिलाएं बेहद उत्सुकता के साथ छलनी से पहले चंद्रमा को देखती हैं और फिर अपने पति के चेहरे का दर्शन करती हैं। इसके बाद चंद्र देव को जल अर्पित (अर्घ्य) किया जाता है और पति अपनी पत्नी को अपने हाथों से पानी पिलाकर व भोजन का पहला निवाला खिलाकर इस कठिन व्रत को संपन्न करवाते हैं

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