रायपुर। छत्तीसगढ़ की माटी का पहला लोक-पर्व ‘हरेली तिहार’ (12 अगस्त) केवल एक पारंपरिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह मनुष्य, प्रकृति और पशुधन के अटूट रिश्ते का सबसे बड़ा प्रमाण है। सावन मास की अमावस्या को मनाए जाने वाले इस त्योहार का राज्य की संस्कृति में अत्यंत गहरा और बहुआयामी महत्व है।
आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर क्यों इस पर्व को छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धड़कन कहा जाता है।
1. धार्मिक व कृषि महत्व: नए कृषि चक्र की शुरुआतछत्तीसगढ़ को ‘धान का कटोरा’ कहा जाता है, और हरेली को यहाँ कृषि चक्र की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है।
धरती मैया के प्रति आभार: सावन तक किसान खेतों में धान की बुवाई और कतई (रोपनी) का काम पूरा कर लेते हैं। इसके बाद वे धरती माता को हरी-भरी ओढ़नी में देखकर उनके प्रति आभार जताते हैं।
कृषि यंत्रों का सम्मान: इस दिन हल, नागर, रापा, कुदाल और फावड़े जैसे लौह उपकरणों को विश्राम देकर उनकी पूजा की जाती है। यह इस बात का संदेश है कि जो साधन हमें अन्न देते हैं, वे पूजनीय हैं।
पशुधन का कल्याण: किसान अपने सबसे बड़े मददगार—गाय और बैलों को नहलाकर उन्हें धूप-दीप दिखाते हैं। इस दिन गोवंश को नमक और जड़ी-बूटियों से युक्त आटे के पेड़े खिलाए जाते हैं ताकि वे बीमारियों से सुरक्षित रहें।
2. वैज्ञानिक महत्व: मौसमी बीमारियों से सुरक्षा का कवचहरेली त्योहार के पीछे गहरा वैज्ञानिक और स्वास्थ्य संबंधी दृष्टिकोण छिपा हुआ है:
नीम की पत्तियों का सैनिटाइजेशन: मानसून (वर्षा ऋतु) के दौरान वातावरण में बैक्टीरिया और मौसमी बीमारियां तेजी से फैलती हैं। हरेली के दिन घरों के मुख्य दरवाजों पर नीम की टहनी टांगने की परंपरा है। नीम एक प्राकृतिक कीटनाशक और एंटी-बैक्टीरियल है, जो हवा को शुद्ध करता है और संक्रामक जीवों को घर में आने से रोकता है।
भेलवा की शाखाएं: किसान अपने खेतों में भेलवा वृक्ष की डालियां गाड़ते हैं। भेलवा के पत्तों में प्राकृतिक रूप से कीटों को नियंत्रित करने की क्षमता होती है, जिससे फसलों को कीड़ों के प्रकोप से सुरक्षा मिलती है।
3. सामाजिक व सांस्कृतिक महत्व: समरसता और खेलों का अनूठा संगमहरेली समाज को आपस में जोड़ने और लोक-परंपराओं को जीवित रखने का माध्यम है:
सामाजिक समरसता: गाँव के लोहार घर-घर जाकर चौखट पर कील ठोकते हैं, यादव (राउत) गोवंश के लिए दवा तैयार करते हैं और बैगा (वैद्य) जड़ी-बूटियाँ लाते हैं। यह त्योहार समाज के हर वर्ग की सहभागिता से पूरा होता है।
गेड़ी नृत्य और शारीरिक संतुलन: बांस से बनी ऊँची ‘गेड़ी’ पर चढ़कर चलना और दौड़ लगाना इस पर्व की सबसे अनूठी पहचान है। वर्षा ऋतु में जब चारों तरफ कीचड़ और पानी भरा होता था, तब प्राचीन समय में गेड़ी का उपयोग सुरक्षित आवागमन के लिए किया जाता था। आज यह शारीरिक संतुलन और स्फूर्ति का एक प्रमुख खेल बन चुका है।
पारंपरिक छत्तीसगढ़ी व्यंजन: इस दिन घरों में ‘गुड़हा चीला’ (चावल आटे और गुड़ का पकवान) बनाया जाता है। सावन के महीने में गुड़ और चावल का यह संयोजन शरीर को तुरंत ऊर्जा प्रदान करने और पाचन क्रिया को दुरुस्त रखने में मददगार होता है।
आधुनिकता के इस दौर में भी छत्तीसगढ़ का हरेली तिहार हमें अपनी जड़ों, पर्यावरण संरक्षण और जीव-दया की याद दिलाता है। यही कारण है कि इस पावन लोक-पर्व का महत्व समय के साथ और अधिक प्रासंगिक होता जा रहा है।








