बलौदा बाजार: डिजिटल जमाने में जहां हर काम और लेन-देन के लिए ऑनलाइन पेमेंट और कैशलेस ट्रांजेक्शन की होड़ मची है, वहीं बलौदाबाजार जिले का एक छोटा सा गांव कोरदा आज भी अपनी पुरानी परंपरा को सहेजे आगे बढ़ रहा है. यहां भादो अमावस्या पर लगने वाले पोला मेले में न कोई नोट चलता है, न कोई डिजिटल स्कैनर. इस मेले की असली करंसी है पूड़ी, ठेठरी, खुरमी, भजिया, चौसेला और अइरसा जैसे छत्तीसगढ़ी व्यंजन.
व्यंजनों के बदले खरीदारी, परंपरा जिसने बदल दी सोच: इस मेले में दुकानदार नोट नहीं मांगते, बल्कि कहते हैं कितनी पूड़ी लोगे. खरीदार भी जेब से रुपये नहीं निकालते, बल्कि थाली से पूड़ी और मिठाइयां देते हैं. यही लेन देन इस मेले की सबसे बड़ी पहचान है. ग्रामीण बताते हैं कि यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी उसी उत्साह के साथ निभाई जा रही है.
परंपरा और मेले की रौनक बरकरार: मेले में मिट्टी और कागज से बने खिलौनों ने सबका मन मोह लिया. बच्चों ने मिट्टी की चिड़िया, नंदी बैल और कागज की दूंगा जैसी कलाकृतियां सजाई. घरौंदा प्रतियोगिता ने बच्चों की रचनात्मकता को नई उड़ान दी. जिनके घरौंदे सबसे आकर्षक रहे, उन्हें इनाम देकर प्रोत्साहित किया गया.
नोट की जगह चलती है पूड़ी ठेठरी और खुरमी पोला पर्व है किसानों और बैलों की आस्था का प्रतीक: पोला त्योहार किसानों के जीवन से जुड़ा है. इस दिन किसान अपने कृषि औजारों की पूजा करते हैं और खेतों में दिन रात मेहनत करने वाले बैलों को सजा-धजाकर श्रृंगार करते हैं. घर घर में मिट्टी के बैलों की पूजा कर समृद्धि की कामना की जाती है.
गांव की परंपरा ने दिया बड़ा संदेश: गांव के बुजुर्गों का कहना है कि यह परंपरा आज़ादी के पहले से चली आ रही है. इसका उद्देश्य है त्योहार को सिर्फ उत्सव न मानकर उसे संस्कृति और परंपरा का पर्व बनाना. इस मेले में उमड़ती भीड़ छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक समृद्धि और सामुदायिक भावना का सजीव उदाहरण भी है.
आने वाली पीढ़ियों को जड़ों से जोड़े रखने की कवायद: गांव के ग्रामीण खिलेंद्र कुमार और नेतराम वर्मा ने बताया कि यह मेला सिर्फ व्यापार का साधन नहीं, बल्कि गांव के रिश्तों को जोड़ने और आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का जरिया है. जिला पंचायत उपाध्यक्ष पवन साहू ने कहा कि इस तरह की परंपराएं आज के समय में दुर्लभ हो गई हैं और इन्हें संरक्षित रखना हमारी जिम्मेदारी है.
यहां नोट नहीं व्यंजन हैं असली करंसी: इस मेले की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां न नकद चलता है, न डिजिटल स्कैनर. दुकानदार न रुपये मांगते हैं न ऑनलाइन पेमेंट को कहते हैं. वे बस इतना पूछते हैं कितनी पूड़ी दोगे. खरीदार भी जेब से पैसे नहीं निकालते, बल्कि घर से लाए पारंपरिक व्यंजन जैसे पूड़ी, ठेठरी, खुरमी, भजिया, चौसेला और अइरसा सौंपकर सामान खरीदते हैं.
कोरदा गांव का अदभुत पोला मेला:गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि यह परंपरा आज़ादी के पहले से चली आ रही है और आज भी उतनी ही शिद्दत से निभाई जाती है. यहां हर लेन देन सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि आपसी विश्वास और रिश्तों का आदान प्रदान है. मेले में आए एक बुजुर्ग ने कहा कि इस मेले की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां रुपये नहीं चलते, बल्कि पूड़ी, ठेठरी, खुरमी, भजिया, चौसेला और अइरसा जैसे पारंपरिक व्यंजनों से ही खरीदी बिक्री होती है.
प्रेम और भाईचारे का प्रतीक: ग्रामीण बताते हैं कि यहां हर लेन देन आपसी विश्वास और रिश्तों का प्रतीक है. दुकानदार भी कहते हैं कि कितनी पूड़ी लोगे. पूड़ी का हिसाब तय होते ही खरीदार थाली से पूड़ी या मिठाई देकर सामान ले जाता है. इस मेले ने यह साबित कर दिया कि परंपरा ही असली पूंजी है. डिजिटल युग में भी कोरदा गांव के लोगों ने अपनी इस अनोखी पहचान को गर्व के साथ सहेजे रखा है.
डिजिटल क्रांति का जमाना:दुनिया तेजी से बदल रही है. मोबाइल की स्क्रीन पर उंगलियां चलाते ही लाखों करोड़ों का लेन देन हो जाता है. शहरों की रफ्तार डिजिटल पेमेंट, यूपीआई स्कैनर और कैशलेस ट्रांजेक्शन से मापी जाती है. लेकिन बलौदा बाजार जिले का एक छोटा सा गांव कोरदा इस दौड़ से अलग अपनी ही धुन में है. यहां आज भी नोटों और सिक्कों की खनक नहीं, बल्कि पारंपरिक व्यंजनों की खुशबू असली करंसी मानी जाती है.
भादो अमावस्या के दिन लगता है मेला:भादो अमावस्या के दिन लगने वाले इस पोला मेले की कहानी जितनी अनोखी है, उतनी ही प्रेरणादायी भी. यह मेला सिर्फ व्यापार का मंच नहीं, बल्कि एक ऐसा सांस्कृतिक उत्सव है जो रिश्तों को जोड़ता है, परंपराओं को संजोता है और आधुनिकता के बीच भी जड़ों से जुड़े रहने का संदेश देता है.
यहां थाली से होती है सौदेबाज़ी: कोरदा गांव के इस मेले में न रुपये चलते हैं, न डिजिटल स्कैनर. यहां दुकानदार न तो ग्राहकों से कहते हैं यूपीआई कर दो और न ही नकद मांगते हैं. ग्राहक भी जेब में रखे नोट या मोबाइल नहीं निकालते, बल्कि घर से लाई हुई थाली में रखी पूड़ी, मिठाई, भजिया, चौसेला और अइरसा जैसे पारंपरिक व्यंजन सौंपकर खिलौने, बर्तन, खिलखिलाती चूड़ियां या मेले की दूसरी सामान ले जाते हैं. यह मेला पैसे के बजाय स्वाद, अपनापन और परंपरा का आदान प्रदान होता है, हर लेन-देन में रिश्तों की गर्माहट महसूस की जाती है.
परंपरा जिसने समय को दी चुनौती: यहां पैसे से कोई मोल भाव नहीं होता. लोग अपने घर से व्यंजन बनाकर लाते हैं और उसी से सौदा करते हैं. इस परंपरा ने हमें सिखाया है कि त्योहार सिर्फ दिखावे के लिए नहीं होते, बल्कि संस्कृति और भाईचारे को मजबूत करने के लिए होते हैं.
बच्चों ने बनाए घरौंदे: मेले में सबसे अधिक रौनक बच्चों से होती है. बच्चों के बनाए मिट्टी और कागज से बने खिलौनों ने सबका मन मोह लिया. मिट्टी की चिड़िया, नंदी बैल और कागज का दूंगा, हर कोने पर कुछ नया और अनोखा देखने को मिला. घरौंदा प्रतियोगिता ने बच्चों की कल्पनाशक्ति को जैसे पंख लगा दिए. छोटे छोटे हाथों ने मिट्टी के कणों को जोड़कर अद्भुत कला की रचना कर डाली








