बिलासपुर में कागजी आंकड़ों का भ्रम, 95% बारिश के बाद भी पचपेड़ी-सीपत में सूखा, खूंटाघाट बांध में बचा 69% पानी

कमलकांत पाटनवार

बिलासपुर में भू-अभिलेख के 95% बारिश के आंकड़ों के बावजूद पचपेड़ी और सीपत जैसे ग्रामीण कमान क्षेत्रों में 22% तक कम बारिश से सूखा है

बिलासपुर 

जिले की भू-अभिलेख शाखा की कागजों में 95 फीसदी बारिश का आंकड़ा भले ही अंचल को तरबतर दिखा रहा हो, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। बारिश के इसी गणित ने खूंटाघाट बांध (संजय गांधी जलाशय) का दम फुल दिया है।

बांध में संचित जल भंडार तेजी से गिरकर महज 69 प्रतिशत पर आ गया है। खरीफ सीजन में धान की बालियां निकलने के नाजुक दौर में फसल बचाने लगातार नहरों से पानी छोड़ा जा रहा है, जिससे आगामी ग्रीष्मकाल में गंभीर जल संकट की आहट सुनाई देने लगी है। जिले की तहसीलों में बारिश की भारी असंतुलन का सीधा खामियाजा खारंग जलाशय को भुगतना पड़ रहा है।

हालांकि डैम क्षेत्र रतनपुर में 1126.9 मिमी और बिलासपुर शहर में 1327.6 मिमी बारिश दर्ज की गई, जिसने जिले की औसत को बढ़ा दिया। इसके ठीक उलट मुख्य सिंचित कमान क्षेत्र पचपेड़ी में 22 प्रतिशत कम (महज 862.3 मिमी), सीपत में 924.7 मिमी और कोटा में 84.6 प्रतिशत बारिश ही हुई।

टेल एरिया में 15 से 22 फीसदी कम बारिश होने से खेतों की नमी गायब है। विभागीय अधिकारियों की अनुसार अगस्त में रक्षाबंधन के बाद से वर्षा पूरी तरह बंद है। कमान क्षेत्र की प्यास बुझाने नहरों से हो रही निरंतर निकासी की चलते बांध तेजी से खाली हो रहा है, जिससे रबी सीजन पर संकट मंडराने लगा है।

69% खूंटाघाट डैम में वर्तमान में बचा कुल संचित जल 1126.9 मिमी डैम क्षेत्र रतनपुर में दर्ज वर्षा, जिसने बढ़ाया औसत 465 मिमी शहर में 1327.6 मिमी और पचपेड़ी 862.3 मिमी की बीच बारिश का भारी अंतर 00 मिमी अक्टूबर में मानसून विदाई की बाद सभी 12 तहसीलों में दर्ज बारिश

आंकड़ों का भ्रम

शहर-रतनपुर तरबतर, ग्रामीण कमान पानी को तरसा जिले का कुल औसत 1079.3 मिमी दर्ज है, जो 10 साल की औसत 1135.9 मिमी का 95 फीसदी दिखता है। शहर में 1327.6 मिमी और रतनपुर में 1126.9 मिमी पानी गिरने से कुल आंकड़ा तो संवर गया, लेकिन पचपेड़ी व सीपत जैसे बड़े कृषि क्षेत्र सूखे रह गए।

कमान क्षेत्र में पानी न बरसने का पूरा भार खूंटाघाट पर पड़ा, जिससे किसानों को बचाने नहरें लगातार चलानी पड़ रही हैं। बाक्स- बालियां निकलने का नाजुक दौर, नहरें ही आखिरी सहारा धान की फसल में इस वक्त बालियां निकल रही हैं, ऐसे समय में खेतों में पानी न रुकने से दानों की फकले (खोखले) होने का खतरा मंडरा रहा है। जिन क्षेत्रों में वर्षा कम हुई है, वहां किसान पूरी तरह नहरों पर निर्भर हैं। फसलों की रक्षा की लिए जल संसाधन विभाग को पूरे महीने नहरें खुली रखनी पड़ रही हैं, जिससे डैम का संचित कोटा तेजी से खाली हो रहा है।

 

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