बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित फर्जी सर्पदंश मुआवजा घोटाले में पुलिस ने एक और बड़ी कार्रवाई की है। जांच के दायरे में आए दो पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार किया गया है। दोनों सिम्स अस्पताल चौकी में पदस्थ थे और उन पर आरोप है कि वे अस्पताल में आने वाले शवों की जानकारी घोटाले से जुड़े गिरोह तक पहुंचाते थे। पुलिस का मानना है कि इसी सूचना के आधार पर गिरोह मृतकों के परिजनों तक पहुंचकर उन्हें सरकारी मुआवजा दिलाने का झांसा देता था।
इस मामले में इससे पहले पुलिस वकील, डॉक्टर, तहसील कार्यालय के कर्मचारियों सहित कई अन्य आरोपियों को गिरफ्तार कर चुकी है। अब पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी से साफ हो गया है कि इस पूरे नेटवर्क में कई स्तरों पर लोगों की मिलीभगत थी।
शव की सूचना मिलते ही सक्रिय हो जाता था गिरोह
पुलिस जांच में सामने आया है कि सिम्स अस्पताल में जैसे ही किसी मृतक का शव पहुंचता था, चौकी में तैनात दोनों पुलिसकर्मी इसकी सूचना कथित रूप से खांडे गिरोह तक पहुंचा देते थे। इसके बाद गिरोह का एक सदस्य मृतक के परिजनों से संपर्क कर उन्हें यह भरोसा दिलाता था कि यदि मौत को सर्पदंश से हुई बताया जाए तो शासन से मिलने वाली चार लाख रुपये की आर्थिक सहायता दिलाई जा सकती है।
लालच में आकर कई परिवार इस प्रक्रिया का हिस्सा बन गए और बाद में फर्जी दस्तावेजों के जरिए मुआवजा राशि हासिल करने की कोशिश की गई।
विधानसभा में गूंजा मामला, फिर तेज हुई कार्रवाई
फर्जी सर्पदंश मुआवजा घोटाले का मामला विधानसभा में उठने के बाद जिला प्रशासन ने जांच को गंभीरता से लिया। इसके बाद नायब नाजिर की ओर से सिविल लाइन, सरकंडा, कोनी, कोतवाली, तोरवा और सिरगिट्टी थाना क्षेत्रों में दर्ज 15 संदिग्ध मामलों में एफआईआर कराई गई।
एसएसपी रजनेश सिंह के निर्देश पर अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक पंकज पटेल के नेतृत्व में विशेष जांच शुरू की गई। टीम ने पुराने प्रकरणों की फाइलों की दोबारा जांच की, जिसमें कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।
ऐसे चलता था करोड़ों का फर्जीवाड़ा
जांच एजेंसियों के अनुसार, इस पूरे रैकेट का कथित मास्टरमाइंड वकील हीराप्रसाद खांडेकर था। उसने अपने नेटवर्क में बैंककर्मियों, तहसील कार्यालय से जुड़े कर्मचारियों और अन्य लोगों को शामिल कर रखा था।
किसी सामान्य मौत के बाद गिरोह के सदस्य मृतक के परिजनों से संपर्क करते थे और उन्हें सर्पदंश से मौत दिखाकर सरकारी मुआवजा दिलाने का प्रस्ताव देते थे। इसके बाद कथित रूप से फर्जी शपथपत्र, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अन्य दस्तावेज तैयार कर तहसील कार्यालय में प्रक्रिया पूरी कराई जाती थी। इतना ही नहीं, मुआवजा राशि प्राप्त करने के लिए बैंक खाते खुलवाने तक की व्यवस्था भी गिरोह ही करता था।
डॉक्टरों की भूमिका भी जांच के दायरे में
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि जांच अभी जारी है और इसमें कई अन्य लोगों की भूमिका की भी पड़ताल की जा रही है। प्रारंभिक जांच में कुछ डॉक्टरों के नाम भी सामने आए हैं, जिनकी संलिप्तता की जांच की जा रही है। पुलिस का दावा है कि आने वाले दिनों में इस मामले में और भी गिरफ्तारियां हो सकती हैं।






