मुंगेली में दोगला रवैया: एक ओर नदी बचाओ अभियान, दूसरी ओर नगर पालिका कर्मचारियों से नदी में डलवाया जा रहा कचरा, पर्दे के पीछे कौन?

मुंगेली( संदीप कुमार यादव )।एक तरफ नगर पालिका और प्रशासन हर मंच से “नदी बचाओ, स्वच्छता अपनाओ” के नारे लगा रहे हैं। पोस्टर, बैनर, रैली और स्कूलों में शपथ दिलवाई जा रही है। वहीं दूसरी तस्वीर मुंगेली की नदी किनारे देखने को मिल रही है, जहां नगर पालिका के कर्मचारी ही खुलेआम नदी में कचरा डालते नजर आ रहे हैं।

यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और चिंताजनक है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या छोटे कर्मचारी अपने मन से ऐसा करेंगे? निश्चित रूप से नहीं। बिना ऊपर से इशारे या मिलीभगत के कोई भी कर्मचारी अपनी नौकरी खतरे में नहीं डालेगा। इसका मतलब साफ है कि पर्दे के पीछे कोई न कोई जिम्मेदार जरूर है।

*जिम्मेदारी तय हो*

नगर पालिका द्वारा समय-समय पर सफाई अभियान चलाए जाते हैं। अखबारों में विज्ञापन छपते हैं और सोशल मीडिया पर फोटो डाली जाती है। लेकिन जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग है। नदी किनारे झाड़ू लगाने के बाद निकला कचरा, नालियों की गाद और अन्य अवशेष सीधे नदी में डाल दिए जाते हैं।

कर्मचारियों का कहना है “जगह नहीं है” या “ऊपर से आदेश है”। अगर ऐसा है तो फिर कार्रवाई सिर्फ सफाईकर्मी पर क्यों? उस अधिकारी और ठेकेदार पर भी सवाल उठता है जो इस पूरी व्यवस्था को चला रहा है। जब तक बड़े लोगों पर गाज नहीं गिरेगी, तब तक छोटे कर्मचारी मोहरे बनते रहेंगे।

*परिणाम गंभीर होंगे*

नदी सिर्फ पानी का स्रोत नहीं है। यह शहर की जैव विविधता, भूजल और हजारों लोगों की आस्था से जुड़ी है। इसमें कचरा डालने से पानी प्रदूषित होगा, मछलियां मरेंगी, बदबू और बीमारियां फैलेंगी। बरसात में यही कचरा बहकर नालियों को जाम करेगा और शहर में जलभराव की समस्या बढ़ाएगा।

सबसे बड़ा नुकसान जनता के भरोसे का है। जब लोग देखेंगे कि सफाई का ठेका लेने वाले ही गंदगी फैला रहे हैं, तो “स्वच्छ भारत” का संदेश खोखला लगने लगेगा।


*अब सख्त कदम जरूरी*


इस मामले में मुंगेली नगर पालिका प्रशासन को तुरंत जवाब देना चाहिए।

1. *उच्च स्तरीय जांच*: वीडियो और फोटो के आधार पर सिर्फ कर्मचारियों पर नहीं, बल्कि जिस अधिकारी ने लापरवाही की या आदेश दिया, उस पर भी कार्रवाई हो।

2. *वैकल्पिक व्यवस्था*: कचरा संग्रहण के लिए नदी से दूर वैज्ञानिक डंपिंग यार्ड तय किया जाए और हर गाड़ी पर GPS व कैमरा लगे।

3. *जनभागीदारी*: स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों को निगरानी समिति में शामिल कर हर महीने रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।

नारे लगाने से नदियां साफ नहीं होंगी। इसके लिए इच्छाशक्ति और जवाबदेही चाहिए। अगर नगर पालिका खुद ही पर्यावरण से खिलवाड़ करेगी तो स्वच्छता अभियान सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाएगा।

समय रहते चेतें, वरना आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी।

Hot Topics

Related Articles