विशेष रिपोर्ट: डॉ. राजेंद्र प्रसाद और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का ऐतिहासिक बस्तर दौरा, विकास और शिक्षा की रखी थी मजबूत नींव

छत्तीसगढ़ के जनजातीय अंचल बस्तर से देश के सर्वोच्च पद ‘राष्ट्रपति भवन’ का नाता बेहद पुराना और आत्मीय रहा है। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और ‘मिसाइल मैन’ डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम, दोनों ने ही इस सुदूर क्षेत्र का दौरा कर बस्तरवासियों के दिलों में एक अमिट छाप छोड़ी थी। आइए इन दोनों महापुरुषों की बस्तर यात्रा की हर एक डिटेल को विस्तार से जानते हैं:

1. डॉ. राजेंद्र प्रसाद (23 मार्च 1953): बस्तर आने वाले देश के पहले राष्ट्रपति

आजादी के कुछ साल बाद ही देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 23 मार्च 1953 को बस्तर का ऐतिहासिक दौरा किया था। यह किसी भी भारतीय राष्ट्रपति का बस्तर की धरती पर पहला कदम था।

• श्रमदान और सामुदायिक विकास का संदेश: डॉ. राजेंद्र प्रसाद की इस यात्रा का मुख्य केंद्र बिंदु ग्रामीण विकास, आत्मनिर्भरता और सामुदायिक सहयोग था।

• गांव में खुली चौपाल और संवाद: मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल के साथ डॉ. प्रसाद जगदलपुर के पास स्थित एक ग्रामीण इलाके में पहुँचे थे। वहाँ उन्होंने सीधे आदिवासी ग्रामीणों के साथ संवाद किया।

• छात्रावास का उद्घाटन और कुएं का भूमिपूजन: ग्रामीणों के विशेष निमंत्रण पर पहुँचे राष्ट्रपति ने स्थानीय लोगों द्वारा आपसी सहयोग और श्रमदान से बनाए गए एक छात्रवास (Hostel) का उद्घाटन किया। इसके साथ ही उन्होंने गाँव में पेयजल की समस्या को दूर करने के लिए एक कुएं के निर्माण का भूमिपूजन भी अपने हाथों से किया था।

• नेहरू जी का संस्मरण: इस ऐतिहासिक दौरे के महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि साल 1955 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने जब बस्तर का दौरा किया, तो उन्होंने अपने भाषण में डॉ. राजेंद्र प्रसाद की सादगी का जिक्र करते हुए आदिवासियों से कहा था, “हमारे राष्ट्रपति कोई राजा या महाराजा नहीं हैं, वह बिहार के एक साधारण किसान हैं जिन्हें जनता ने चुना है, और वे आपके बीच आ चुके हैं”।

2. डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम (4 जून 2004): जब राष्ट्रपति ने बस्तर को दिया ‘बिजली का तोहफा’

वैज्ञानिक सोच और बच्चों से अगाध प्रेम करने वाले जन-राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने 4 जून 2004 को बस्तर का दौरा किया था। हालांकि, बस्तर से उनका नाता काफी पुराना था।

• गोपनीय दौरों का अनसुना सच: राष्ट्रपति बनने से बहुत पहले, एक शीर्ष रक्षा वैज्ञानिक (DRDO चीफ) के रूप में डॉ. कलाम कई बार बस्तर आ चुके थे। एक जनसभा में उन्होंने स्वयं साझा किया था कि वे 20 से अधिक बार बस्तर के गोपनीय दौरे कर चुके थे। बस्तर के गिरोला और मारडूम इलाकों में डीआरडीओ (DRDO) से जुड़े केंद्रों व परीक्षणों की रूपरेखा तैयार करने में उनकी अहम भूमिका मानी जाती है।

• तोकापाल के रानसरगीपाल गांव का ऐतिहासिक दौरा: 4 जून 2004 को राष्ट्रपति के रूप में डॉ. कलाम बस्तर के तोकापाल विकासखंड के रानसरगीपाल गांव पहुँचे थे। वहाँ उन्होंने एक विशाल जनसभा को संबोधित किया।

• गाँव को मिला ‘बिजली का तोहफा’: कलाम साहब की इस यात्रा के बाद ही रानसरगीपाल गाँव में पहली बार बिजली पहुँची थी। ग्रामीणों के लिए देश के राष्ट्रपति का उनके छोटे से गाँव में आना और बुनियादी सुविधाएं बहाल करना किसी बड़े सपने के सच होने जैसा था।

• ‘अब्दुल कलाम राष्ट्रपति पारा’: डॉ. कलाम की सादगी, बच्चों के प्रति उनका स्नेह और आदिवासियों के जीवन स्तर को सुधारने की चिंता से प्रभावित होकर, बस्तर के ग्रामीणों ने एक पूरे मोहल्ले का नाम ही आधिकारिक रूप से ‘अब्दुल कलाम राष्ट्रपति पारा’ रख दिया, जो आज भी उनके प्रति बस्तर के आदिवासियों के अगाध प्रेम का प्रतीक है।

• वैज्ञानिक सोच का प्रसार: उन्होंने अपनी यात्रा के दौरान बस्तर के जनजातीय बच्चों को ‘वैज्ञानिक सोच’ अपनाने और शिक्षा के जरिए जीवन बदलने का मूलमंत्र दिया था।

बस्तर के इतिहास में महत्व

जहाँ डॉ. राजेंद्र प्रसाद के दौरे ने नव-स्वतंत्र भारत में बस्तर के आदिवासियों को यह भरोसा दिलाया कि देश का शीर्ष नेतृत्व उनके साथ खड़ा है, वहीं डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के दौरों ने सुदूर वनांचल में आधुनिक शिक्षा, बिजली और विकास की नई चेतना का संचार किया। यही वजह है कि आज भी बस्तर के लोक-इतिहास में इन दोनों राष्ट्रपतियों के दौरों को बेहद आदर के साथ याद किया जाता है।

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