विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरे की 600 साल पुरानी ऐतिहासिक जोगी बिठाई रस्म इस बार एक बड़े विवाद की वजह से सुर्खियों में आ गई है, जिसके चलते सदियों से चली आ रही परंपरा पर गहरा असर पड़ा है। परंपरा के अनुसार, बस्तर दशहरे को शांतिपूर्ण और निर्विघ्न संपन्न कराने के लिए बड़े आमाबाल गांव के हल्बा समाज का एक युवक जगदलपुर के ऐतिहासिक सिरहासार भवन में बने चार फीट गहरे कुंड में नौ दिनों तक निर्जला उपवास रखकर कठिन तपस्या करता है। इस वर्ष आमाबाल निवासी दौलत कुमार नाग जोगी के रूप में इस कठिन साधना में लीन थे, लेकिन अक्टूबर 2026 में मुरिया दरबार में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के आगमन और सुरक्षा व्यवस्था का हवाला देते हुए प्रशासन द्वारा जोगी और उनके परिवार को अचानक सिरहासार भवन से बेदखल कर दिया गया। जोगी परिवार का आरोप है कि उन्हें बिना किसी पूर्व सूचना, नोटिस या जानकारी के अचानक वहां से हटा दिया गया, जिसके कारण गहरा मलाल और आक्रोश व्यक्त करते हुए वे दशहरा उत्सव को बीच में ही छोड़कर अपने पैतृक गांव लौट गए।
इस प्रशासनिक कार्रवाई के कारण बस्तर दशहरे की पुरातन धार्मिक व्यवस्था में एक बड़ा व्यवधान उत्पन्न हो गया है क्योंकि जोगी परिवार के अचानक चले जाने से जोगी उठाई की रस्म, बाहर रैनी विधान और पूर्व राजपरिवार के साथ होने वाला पारंपरिक नवाखानी अनुष्ठान पूरी तरह से प्रभावित हो गया या छूट गया। इसके साथ ही जोगी परिवार के साथ आए ग्रामीण भी अपने पारंपरिक आंगा और देवी-देवताओं को मुख्य विधानों में शामिल नहीं करा सके। इस घटना ने स्थानीय स्तर पर एक गंभीर सामाजिक और राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है, जहां आदिवासी समाज और विभिन्न संगठन इस कदम को आदिम परंपराओं और संस्कृति का अनादर मानकर सरकार तथा प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं।
इस पूरे विवाद के पीछे एक और गहरा सामाजिक दर्द भी खुलकर सामने आया है, जिसमें जोगी दौलत नाग और उनके परिवार ने बयां किया कि इस कठिन जोगी विधान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी निभाने के कारण उन्हें अपनी ही मूल हल्बा जाति में औपचारिक रूप से शामिल होने के लिए सामाजिक स्तर पर दंश और बहिष्कार झेलना पड़ा है। इसके अतिरिक्त, समुदाय लंबे समय से इस बात को लेकर भी आक्रोशित है कि शासकीय और स्कूली दस्तावेजों में उनकी मूल जाति ‘हल्बा’ के बजाय ‘जोगी’ दर्ज कर दी जाती है, जिससे नई पीढ़ी के बच्चों को जाति प्रमाण पत्र बनवाने और शिक्षा में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इस जातिगत विसंगति और प्रशासन के उपेक्षित व्यवहार से आहत होकर पारंपरिक जोगी परिवार ने भविष्य में इस ऐतिहासिक अनुष्ठान को बंद करने तक की चेतावनी दे दी है, जिसने बस्तर दशहरे के इस महत्वपूर्ण सांस्कृतिक स्तंभ के भविष्य पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।







