सच्ची कहानी : सरस्वती वैद्य की वह अधूरी कहानी आज भी रिश्तों के पीछे छिपे इस भयानक अंधेरे की गवाह है

“दीवारों के पीछे छिपा सन्नाटा कभी-कभी चीख से भी ज्यादा खौफनाक होता है, खासकर तब, जब वह सन्नाटा किसी रूह की आखिरी तड़प को छुपाए बैठा हो।”

यह कहानी सपनों के शहर मुंबई से सटे मीरा रोड इलाके की है। जून 2023 के शुरुआती दिन थे। ‘आकाशदीप’ नाम की एक बहुमंजिला रिहायशी इमारत के जे-विंग के सातवें माले पर बने फ्लैट नंबर 704 से पिछले कुछ दिनों से एक अजीब और तीखी बदबू आ रही थी। शुरुआत में पड़ोसियों को लगा कि कोई आवारा जानवर कहीं मर गया होगा, लेकिन वक्त गुजरने के साथ वह सड़न इतनी असहनीय हो गई कि सांस लेना दूभर हो गया। 7 जून की शाम, सोसायटी के कुछ लोग तंग आकर फ्लैट 704 का दरवाजा खटखटाने पहुंचे। भीतर से कोई आवाज नहीं आई। जब बदबू का स्रोत साफ हो गया, तो पुलिस को इत्तला दी गई। किसी को अंदाजा नहीं था कि उस बंद फ्लैट के भीतर इंसानी क्रूरता का एक ऐसा घिनौना मंजर इंतजार कर रहा था, जिसने आधुनिक समाज की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया।

 

उस फ्लैट में 56 साल का मनोज साने और उसकी 32 साल की लिव-इन पार्टनर सरस्वती वैद्य पिछले तीन सालों से रह रहे थे। सरस्वती एक अनाथ लड़की थी, जो मनोज से एक राशन की दुकान पर मिली थी। धीरे-धीरे दोनों करीब आए और मीरा रोड के इस फ्लैट में साथ रहने लगे। बाहर की दुनिया के लिए वे एक शांत और सामान्य जोड़ा थे, जो किसी से ज्यादा बात नहीं करते थे। लेकिन उस फ्लैट की बंद दीवारों के भीतर एक खौफनाक साजिश अंजाम दी जा चुकी थी। जब पुलिस ने मास्टर चाबी से दरवाजा खोला, तो पूरा कमरा रूम फ्रेशनर और कीटनाशकों की गंध से भरा हुआ था, लेकिन वह रसायनों की खुशबू उस सड़ते हुए मांस की गंध को छुपाने में नाकाम रही थी।

 

पुलिस जैसे ही रसोई घर की तरफ बढ़ी, वहां का नजारा देखकर अनुभवी से अनुभवी जासूसों के भी पैर कांप गए। रसोई के प्लेटफॉर्म पर, बर्तनों के बीच, इंसानी शरीर के टुकड़े रखे हुए थे। मनोज साने ने कुछ दिन पहले एक मामूली घरेलू विवाद के बाद सरस्वती वैद्य की बेरहमी से हत्या कर दी थी। लेकिन अपराध को छुपाने के लिए उसने जो रास्ता चुना, वह किसी भी आम इंसान की सोच से परे था। वह पकड़े जाने के डर से पूरी तरह हैवान बन चुका था। उसने बाजार से एक इलेक्ट्रिक ट्री-कटर (पेड़ काटने वाली आरी) खरीदी और सरस्वती के शव के कई छोटे-छोटे टुकड़े कर दिए।

 

वह यहीं नहीं रुका। बदबू को कम करने और हड्डियों से मांस को आसानी से अलग करने के लिए वह उन टुकड़ों को रसोई के प्रेशर कुकर में उबालता था। कुछ टुकड़ों को उसने मिक्सर में पीसकर ठिकाने लगाने की कोशिश की, तो कुछ को गैस स्टोव पर सीधे भून दिया। वह रोज रात के अंधेरे में इन उबले हुए टुकड़ों को छोटे-छोटे पैकेटों में भरकर इलाके के आवारा कुत्तों को खिलाने निकल जाता था ताकि समाज को कभी भनक न लगे कि फ्लैट नंबर 704 से एक पूरी जीती-जागती इंसान गायब हो चुकी है। जब पुलिस ने मनोज को उसी फ्लैट से गिरफ्तार किया, तो उसके चेहरे पर न तो कोई शिकन थी और न ही अपने किए का कोई पछतावा।

 

जांच में यह साफ हुआ कि मनोज साने एक बेहद शातिर और विक्षिप्त मानसिकता का अपराधी था। उसने पुलिस को गुमराह करने के लिए कई कहानियां गढ़ीं, यहाँ तक कि यह दावा भी किया कि सरस्वती ने खुदकुशी की थी और वह सिर्फ बदनामी के डर से शव को ठिकाने लगा रहा था। लेकिन फॉरेंसिक सबूतों और उसकी डायरी के पन्नों ने उसके झूठ का पर्दाफाश कर दिया। ‘शैडो ट्रैप’ का यह वास्तविक मामला यह साबित करता है कि कभी-कभी सबसे भयानक दरिंदगी किसी सुनसान जंगल में नहीं, बल्कि हमारे पड़ोस के एक शांत से दिखने वाले घर के भीतर घटित हो रही होती है।

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