11 सितंबर 2001 की वह खौफनाक सुबह, जिसने न सिर्फ अमेरिका बल्कि पूरी दुनिया की तकदीर और सुरक्षा व्यवस्था को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया, आज अपनी 25वीं बरसी पर एक बार फिर इतिहास के सबसे काले पन्नों को सामने ले आई है। स्थानीय समयानुसार सुबह ठीक 8:46 बजे, जब न्यूयॉर्क शहर रोज की तरह अपनी रफ्तार पकड़ रहा था, अचानक अल-कायदा के आतंकवादियों द्वारा हाईजैक किया गया पहला विमान वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के नॉर्थ टावर से टकराया और चंद मिनटों बाद 9:03 बजे दूसरा विमान साउथ टावर के सीने को चीरता हुआ पार हो गया। देखते ही देखते दुनिया की सबसे ऊंची इमारतों में शुमार ये गगनचुंबी ट्विन टावर्स आग के शोलों में तब्दील हो गए और कुछ ही घंटों में ताश के पत्तों की तरह ढहकर मलबे के ढेर में बदल गए। इस बीच आतंक का यह खूनी खेल सिर्फ न्यूयॉर्क तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सुबह 9:37 बजे एक तीसरा विमान वाशिंगटन डी.सी. में अमेरिकी सैन्य ताकत के केंद्र ‘पेंटागन’ पर क्रैश कराया गया, जबकि चौथा विमान (फ्लाइट 93) जांबाज यात्रियों के संघर्ष के कारण पेन्सिलवेनिया के एक मैदान में क्रैश हो गया, जो संभवतः अमेरिकी संसद भवन की ओर बढ़ रहा था।इस भीषण और कायराना आत्मघाती हमले ने पल भर में 90 से अधिक देशों के कुल 2,977 बेकसूर लोगों की जान ले ली, जिसमें सैकड़ों जांबाज दमकलकर्मी और पुलिसकर्मी भी शामिल थे जो दूसरों को बचाने के लिए मौत के मुंह में कूद पड़े थे। हमले के बाद तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने इसे ‘इंसानियत पर हमला’ करार देते हुए आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक युद्ध (War on Terror) का ऐलान किया, जिसके बाद दुनिया के कई देशों के समीकरण पूरी तरह बदल गए और सालों बाद इस साजिश के मास्टरमाइंड ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान के एबटाबाद में ढेर कर अमेरिकी सेना ने इस त्रासदी का हिसाब पूरा किया। आज ढाई दशक बीत जाने के बाद भी ‘ग्राउंड जीरो’ पर बने स्मारक की दीवारें और वहां जलती अमर ज्योति उन खोई हुई मासूम जिंदगियों की याद दिलाती हैं, और यह दिन पूरी दुनिया को आगाह करता है कि कट्टरपंथ और आतंक के खिलाफ जंग में आज भी ढील नहीं दी जा सकती।








