EVM पर सवाल उठाने वाली कांग्रेस को सीएम साय का जवाब! बोले- बैलेट पेपर से भी मिली हार

रायपुर : उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार और कर्नाटक में हुए विधान परिषद चुनावों के नतीजों को लेकर छत्तीसगढ़ की सियासत गरमा गई है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कांग्रेस पर जोरदार निशाना साधते हुए बैलेट पेपर और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) को लेकर चल रही राजनीतिक बहस पर सवाल उठाए हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि चुनाव में जीत हासिल करने के लिए मतदान की पद्धति से ज्यादा जनता का विश्वास महत्वपूर्ण होता है। उन्होंने कांग्रेस को चुनावी हार के बाद मतदान प्रक्रिया पर सवाल उठाने के बजाय अपनी रणनीति और जनसमर्थन की समीक्षा करने की सलाह दी। मुख्यमंत्री साय ने 28 अक्टूबर को जारी बयान में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार और कर्नाटक की 28 विधान परिषद सीटों के चुनावों का जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि बैलेट पेपर से हुए इन चुनावों में कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत सकी। हालांकि, यह बयान उस समय उपलब्ध नतीजों के संदर्भ में दिया गया था और बाद की रिपोर्टों में महाराष्ट्र की एक सीट पर कांग्रेस की जीत की जानकारी भी सामने आई।मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कांग्रेस की ओर से चुनाव प्रक्रिया और ईवीएम पर उठाए जाने वाले सवालों को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि कांग्रेस बार-बार बैलेट पेपर से मतदान कराने की मांग करती रही है, लेकिन विधान परिषद चुनावों में बैलेट पेपर का इस्तेमाल होने के बावजूद पार्टी को उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली। सीएम साय ने सवाल उठाया कि जब चुनाव बैलेट पेपर से हुए हैं, तब कांग्रेस अपनी पराजय के लिए किसे जिम्मेदार ठहराएगी। मुख्यमंत्री का कहना था कि राजनीतिक दलों को चुनाव परिणामों का आकलन जनता के समर्थन और अपने संगठनात्मक प्रदर्शन के आधार पर करना चाहिए।

चार राज्यों की 28 विधान परिषद सीटों पर हुआ चुनाव उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार और कर्नाटक में विधान परिषद की कुल 28 सीटों के लिए चुनाव कराए गए। इन चुनावों में बैलेट पेपर का इस्तेमाल किया गया। 28 अक्टूबर को सामने आए प्रारंभिक चुनावी विवरणों के अनुसार, कांग्रेस ने चार राज्यों में कुल 12 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। उत्तर प्रदेश में पार्टी ने उम्मीदवार नहीं उतारे थे। कर्नाटक में कांग्रेस को विशेष रूप से बड़ा झटका लगा। राज्य में कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद विधान परिषद की चारों सीटों पर भाजपा और जनता दल (सेक्युलर) गठबंधन ने जीत दर्ज की। भाजपा ने तीन सीटों पर सफलता हासिल की, जबकि जेडीएस को एक सीट मिली। इन परिणामों को राज्य की राजनीति में कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण झटका माना जा रहा है।

कर्नाटक में सत्ता के बावजूद कांग्रेस को नहीं मिली सीट मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने अपने बयान में कर्नाटक का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि राज्य में कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद विधान परिषद चुनावों में पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई। कर्नाटक की चार सीटों पर भाजपा-जेडीएस गठबंधन की जीत ने राज्य में सत्तारूढ़ कांग्रेस के सामने राजनीतिक चुनौती पेश की है। हालांकि, विधान परिषद की इन सीटों के परिणामों से कर्नाटक की विधानसभा में कांग्रेस सरकार के बहुमत पर कोई सीधा असर नहीं पड़ता। मुख्यमंत्री ने कहा कि लोकतंत्र में चुनाव जीतने के लिए जनता का समर्थन सबसे महत्वपूर्ण है। उनका कहना था कि राजनीतिक दलों को चुनावी हार के बाद आरोप-प्रत्यारोप करने के बजाय यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि मतदाताओं का समर्थन हासिल करने में वे कहां पीछे रह गए। उन्होंने कांग्रेस को अपनी चुनावी रणनीति, संगठन और जनता के बीच विश्वसनीयता को लेकर आत्ममंथन करने की सलाह दी। सीएम साय ने आरोप लगाया कि चुनावी असफलताओं के बाद मतदान प्रक्रिया पर सवाल उठाकर कांग्रेस वास्तविक राजनीतिक मुद्दों से ध्यान हटाने की कोशिश करती है। पीएम मोदी ने भी कांग्रेस के प्रदर्शन पर उठाए सवाल विधान परिषद चुनावों के नतीजों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 28 अक्टूबर को कांग्रेस पर राजनीतिक तंज कसा था। प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर चार राज्यों की 28 विधान परिषद सीटों और बैलेट पेपर से मतदान का उल्लेख करते हुए कांग्रेस के प्रदर्शन पर सवाल उठाया। उनके इस बयान के बाद ईवीएम बनाम बैलेट पेपर को लेकर राजनीतिक चर्चा तेज हो गई। वहीं, कांग्रेस ने ईवीएम को लेकर अपनी आपत्तियों के संदर्भ में लोकसभा और विधानसभा चुनाव भी बैलेट पेपर से कराने की मांग दोहराई। इस प्रकार चुनावी प्रक्रिया को लेकर दोनों पक्षों के बीच राजनीतिक मतभेद फिर सामने आए। EVM बनाम बैलेट पेपर की बहस फिर तेज देश में ईवीएम और बैलेट पेपर को लेकर लंबे समय से राजनीतिक बहस होती रही है। विपक्ष के कुछ दल मतदान प्रक्रिया की पारदर्शिता और चुनावी सत्यापन को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। दूसरी ओर, भाजपा नेताओं का कहना है कि चुनाव परिणामों को केवल मतदान तकनीक से जोड़ना उचित नहीं है और मतदाताओं का निर्णय ही चुनावी जीत-हार का आधार होना चाहिए। विधान परिषद चुनावों में मतदान की प्रक्रिया लोकसभा और विधानसभा चुनावों से अलग भी हो सकती है। ऐसे में इन चुनावों के परिणामों को अन्य चुनावों की मतदान प्रणालियों का स्वतः निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता।

 

 

 

 

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