सरकारी अस्पताल बना निजी प्रचार का अड्डा..! महासमुंद जिला अस्पताल की दीवारें मरीजों की पीड़ा से ज्यादा निजी लैब-मेडिकल स्टोर के होर्डिंग चमका रही

महासमुंद (संतन दास)। जिले के रायपुर रोड स्थित ग्राम खरोरा मेडिकल कॉलेज जहां स्वास्थ्य सेवाओं का प्रमुख केंद्र माने जाने वाला स्व. श्री पुरुषोत्तम लाल कौशिक जिला चिकित्सालय आज अपनी गरिमा खोता नजर आ रहा है। जहां मरीज इलाज और राहत की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं, वहां अस्पताल की दीवारें, प्रवेश द्वार और मुख्य मार्ग निजी पैथोलॉजी लैब, मेडिकल स्टोर्स तथा प्राइवेट एम्बुलेंस वालों के विज्ञापनों से पटे पड़े हैं। सरकारी अस्पताल अब निजी व्यवसायियों का फ्री प्रचार प्लेटफॉर्म बन गया है।

प्रवेश द्वार पर ही शुरू होता है ‘विज्ञापन बाजार’

अस्पताल के मुख्य एंट्री और एग्जिट गेट पर ‘निःशुल्क गर्म पानी’ जैसे सरकारी संदेश की आड़ में निजी मेडिकल स्टोर्स और पैथोलॉजी सेंटर्स के बड़े-बड़े बोर्ड और पेंटिंग्स लगे हुए हैं। अस्पताल की चारदीवारी, गलियारों और मुख्य रास्तों पर जगह-जगह निजी नर्सिंग होम्स के बैनर और रंग-बिरंगी पेंटिंग्स दिखाई दे रही हैं। तस्वीरों में साफ नजर आता है कि मरीजों की सुविधा के नाम पर निजी संस्थाओं का प्रचार-प्रसार खुलेआम चल रहा है।

यह स्थिति न केवल अस्पताल की गरिमा को ठेस पहुंचा रही है, बल्कि गरीब और मजबूर मरीजों को भ्रमित भी कर रही है। जो लोग सरकारी इलाज की उम्मीद में आते हैं, उन्हें दीवारों पर चमकते इन विज्ञापनों के जरिए निजी जांच केंद्रों और दुकानों की ओर धकेला जा रहा है।

मरीजों की मजबूरी का खुला शोषण..?

अस्पताल प्रशासन को यह सब दिखाई नहीं दे रहा या फिर जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है? यह सवाल पूरे जिले में उठ रहा है। गरीब मरीज, जो पहले से आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं, सरकारी अस्पताल में भी निजी खर्चे का बोझ उठाने को मजबूर हो रहे हैं।

स्थानीय लोग बताते हैं कि कई बार इन विज्ञापनों को हटाया गया, लेकिन कुछ दिन बाद फिर से ये निजी बोर्ड और पेंटिंग्स वापस आ जाते हैं। यह बार-बार दोहराई जा रही हरकत अब सिस्टम की मिलीभगत की ओर इशारा कर रही है।


कानूनी उल्लंघन और सख्त कार्रवाई की मांग


सार्वजनिक स्थानों पर बिना अनुमति विज्ञापन लगाना या दीवारों को पेंट करके विरूपित करना पूरी तरह अवैध है। विशेषज्ञों के अनुसार निम्नलिखित कानूनों के तहत कार्रवाई हो सकती है

  • संपत्ति विरूपण निवारण अधिनियम के तहत बिना अनुमति विज्ञापन लगाने वालों पर जुर्माना और यहां तक कि जेल की सजा का प्रावधान है।
  • लोक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम 1984 के अंतर्गत सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने पर सख्त दंडनीय प्रावधान हैं।
  • यदि अस्पताल प्रशासन की लापरवाही या मिलीभगत पाई गई तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच, निलंबन और अन्य कार्रवाई की जा सकती है।
  • निजी लैब और स्टोर्स के अवैध प्रचार पर उनके लाइसेंस रद्द करने और सील करने की भी संभावना है।

बसंत माहेश्वरी, अस्पताल प्रबंधन (जिला अस्पताल महासमुंद, छत्तीसगढ़) ने स्पष्ट कहा है:

“इन लोगों को बार-बार समझाईश दी जा चुकी है और विज्ञापन हटाए भी जा चुके हैं, फिर भी वे अपनी हरकतें दोहराते रहते हैं। अब इनके खिलाफ पुलिसिया कार्रवाई कर जुर्माना और सजा हेतु नोटिस जारी किया जाएगा।”


क्या अब प्रशासन जागेगा..?

यह मामला सिर्फ महासमुंद जिला अस्पताल तक सीमित नहीं है। कई सरकारी अस्पतालों में ऐसी ही स्थिति देखी जा रही है, जहां मरीजों की सेहत से ज्यादा निजी व्यावसायिक हित हावी हो रहे हैं।

स्थानीय नागरिकों, जनप्रतिनिधियों और मीडिया को अब सक्रिय होकर इस मुद्दे को उठाना चाहिए ताकि जिला अस्पताल फिर से वास्तविक स्वास्थ्य सेवा केंद्र बन सके, न कि निजी प्रचार का अड्डा।


  • सरकार और स्वास्थ्य विभाग से अपील

महासमुंद जिला अस्पताल की दीवारों से सभी अवैध विज्ञापन तुरंत हटाए जाएं, दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए और भविष्य में ऐसे प्रचार पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए। मरीजों की सेहत सबसे ऊपर है — इसे कोई निजी हित नहीं भटका सकता।

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