15 अगस्त 1947 को देश आजाद होने वाले दिन भारत में एक अनोखा और मिला-जुला माहौल था, जहाँ सदियों की गुलामी से मुक्ति का महाजश्न था तो वहीं विभाजन का गहरा दर्द भी सीने में छुपा था।
- दिल्ली का माहौल: आधी रात का वो जादुई पल14 अगस्त की रात से ही राजधानी दिल्ली और देश के मुख्य शहरों में अभूतपूर्व उत्साह था। भारी बारिश के बावजूद संसद भवन (तत्कालीन संविधान सभा) के बाहर लाखों लोगों का हुजूम जमा था। जैसे ही घड़ी की सुइयों ने रात के 12 बजाए, पूरा देश शंखध्वनि, तालियों और ‘जय हिंद’ के नारों से गूंज उठा।देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपना सुप्रसिद्ध भाषण ‘ट्रीस्ट विद डेस्टिनी’ (नियति से साक्षात्कार) दिया। उन्होंने कहा, “दबाए गए देश की आत्मा को अब अपनी अभिव्यक्ति मिल गई है।” लोगों की आंखों में खुशी के आंसू थे और हर चेहरा इस ऐतिहासिक पल का गवाह बनकर गौरवान्वित था।
- आज़ादी के दिन के 3 दिलचस्प और अनछुए किस्से
- 1. जब वायसराय की बग्गी में आम लोग भी सवार हो गए सुबह के समय वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन और लेडी माउंटबेटन जब ऐतिहासिक बग्गी में सवार होकर इंडिया गेट (प्रिंसिस पार्क) पर झंडा फहराने के कार्यक्रम के लिए निकले, तो सड़कों पर इतनी भारी भीड़ थी कि बग्गी का आगे बढ़ना नामुमकिन हो गया। लोग आज़ादी की खुशी में इतने दीवाने थे कि वे सुरक्षा घेरा तोड़कर माउंटबेटन की बग्गी पर ही चढ़ गए। माउंटबेटन ने भी किसी को नहीं रोका; उन्होंने मुस्कुराकर आम जनता का स्वागत किया और लोगों को अपने साथ बग्गी में बैठाकर कार्यक्रम स्थल तक ले गए
- 2. जश्न से दूर, दंगों की आग बुझाते। ‘बापू’जहाँ पूरी दिल्ली और देश के बड़े शहर रोशनी और मिठाइयों से सराबोर थे, वहीं आज़ादी के इस महानायक महात्मा गांधी दिल्ली के जश्न से हजारों किलोमीटर दूर कलकत्ता (अब कोलकाता) में थे। विभाजन के कारण भड़के सांप्रदायिक दंगों से बापू का दिल छलनी था। उन्होंने 15 अगस्त 1947 के पूरे दिन न तो कोई जश्न मनाया और न ही कोई संदेश जारी किया; वे पूरे दिन उपवास (अनशन) पर रहे और प्रार्थना करते हुए लोगों से शांति बनाए रखने की अपील करते रहे।
- 3. सरहद का वो अजीबोगरीब संशय 15 अगस्त को देश आज़ाद तो हो गया, लेकिन पंजाब और बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लाखों परिवारों को यह मालूम ही नहीं था कि वे भारत का हिस्सा हैं या पाकिस्तान का। दरअसल, दोनों देशों के बीच सीमा रेखा खींचने वाले सिरिल रेडक्लिफ ने अपनी रिपोर्ट तो तैयार कर ली थी, लेकिन माउंटबेटन ने इसे जानबूझकर 17 अगस्त को सार्वजनिक किया। नतीजतन, कई गांवों के लोग स्वतंत्रता दिवस के दिन असमंजस और डर के साये में तिरंगा और पाकिस्तानी झंडा दोनों हाथ में लिए बैठे थे।
- आज़ादी का यह सवेरा अपने साथ खुशियों की सौगात तो लाया, लेकिन इसके साथ ही विभाजन की एक ऐसी त्रासदी भी आई जिसने इतिहास को झकझोर कर रख दिया। एक तरफ जहां दिल्ली की सड़कों पर तिरंगे लहरा रहे थे, वहीं दूसरी तरफ पंजाब और बंगाल की सीमाओं पर लाखों शरणार्थी अपना घर-बार छोड़कर अपनी जान बचाने के लिए सीमाओं के आर-पार भाग रहे थे। देश ने आज़ादी के लिए एक बहुत बड़ी मानवीय कीमत चुकाई थी।फिर भी, 200 वर्षों के दमनकारी ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का अंत हो चुका था। भारत अब अपने भाग्य का विधाता खुद बन चुका था और एक नए, संप्रभु और लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में विश्व पटल पर अपनी नई इबारत लिखने के लिए तैयार था।












