किसानों ने कृषि कार्य रखा बंद, घरों में बने ठेठरी-खुरमी और चीला; गांवों में सुआ, फुगड़ी व बैल दौड़ के आयोजन

बलौदाबाजार ,भादो अमावस्या के अवसर पर गुरुवार को जिले में पोला पर्व उत्साह और पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया गया। गांव से लेकर शहर तक पर्व की रौनक देखने को मिली। ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों ने कृषि कार्य बंद रखकर बैलों और कृषि उपकरणों की विधिवत पूजा-अर्चना की। घरों में छत्तीसगढ़ी पारंपरिक पकवान ठेठरी, खुरमी, चीला और बड़ा सहित विभिन्न व्यंजन बनाकर भोग लगाया गया।

पोला पर्व पर गांवों में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए गए। महिलाओं ने सज-धजकर सामूहिक रूप से पर्व मनाया। पोला पटकने की परंपरा के साथ सुआ नृत्य, खो-खो और फुगड़ी जैसे आयोजन हुए। किसानों ने बैलों का श्रृंगार कर उनकी पूजा की और घर-परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। ग्रामीण अंचलों में बैल दौड़ प्रतियोगिताओं का भी आयोजन किया गया, जिसमें लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

 

एक दिन पहले से बनने लगे पारंपरिक पकवान: पोला पर्व को लेकर घरों में एक दिन पहले से ही तैयारियां शुरू हो गई थीं। ठेठरी, खुरमी, गुझिया, चीला सहित अन्य पारंपरिक पकवान बनाए गए। पूजा के दौरान इन पकवानों का मिट्टी के बर्तनों में भोग लगाया गया। मान्यता है कि इस परंपरा से घर में अन्न-धन की कमी नहीं होती और सुख-समृद्धि बनी रहती है।

 

भोजली विसर्जन के साथ तीज पर्व की शुरुआत: पोला पर्व पर भोजली विसर्जन की परंपरा भी निभाई गई। तीज पर्व के प्रथम दिन बोई गई भोजली की विधिवत पूजा-अर्चना के बाद महिलाओं ने रामधुनी के साथ नगर भ्रमण किया। इसके बाद पिपरहा तालाब में भोजली का विसर्जन किया गया। ठाकुर देव चौक, मावली चौक सहित विभिन्न स्थानों पर महिलाओं ने पोला पटकने की परंपरा निभाई। इसके साथ ही तीज पर्व की शुरुआत हुई। ग्राम रिसदा, सोनाडीह, बिटकुली, सेम्हराडीह, बोईरडीह और लटुवा सहित आसपास के गांवों में बच्चों ने मिट्टी से बनाए गए नांदिया बैलों को सजाकर खूब खेला। पूजा के बाद बैलों में पहिए लगाकर बच्चों ने उन्हें गली-मोहल्लों में दौड़ाया। छोटी बच्चियां मिट्टी के खिलौने और जांता-चुकी लेकर खेलती नजर आईं। दिनभर बच्चों के नांदिया बैल दौड़ाने से गांवों की गलियां गुलजार रहीं। ग्राम चांपा के किसान मनीराम यादव ने बताया कि पोला के दिन खेती-किसानी का कार्य बंद रहता है। मान्यता है कि इसी समय धान की फसल गर्भ धारण करती है। पोला पर्व के बाद तीजहारिन महिलाएं मायके जाकर कड़ु भात खाती हैं और इसके बाद हरितालिका तीज का व्रत रखती हैं। पर्व को लेकर पूरे जिले में बच्चों से लेकर बड़ों तक खासा उत्साह देखने को मिला।

 

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